Shiwani

Dil-Se-Desi

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KAUN

Posted by shiwuz on December 30, 2009

khushnuma aankhon ke bheetar, chhupi nami pehchaane kaun
zaahir khushi har koi jaane, dil mein dard hai jaane kaun

raat aur din bas yehi silsila, kaun sahi hai kaun galat
lamha lamha toot toot kar, khatm ho raha jaane kaun

dheeme dheeme pighalte hue, armaano ke shaffaq ye jaam
gumshuda koi shaks maze se, pee raha hai jaane kaun

subah subah har roz vahin se, ugta hai suraj, koi shak nahi
kaunsi aisi saher mein dooba, andhera phir bhi hai jaane kaun

vo jo kho gaya ek pal mein, sadiyon se jo paa na saka
deewangi ko sar pe baandh ke, dhoond raha hai jaane kaun

meri hi tarah dard mein dooba, mere libaas mein kaun hai tu
koi baat chale to andaaza ho, zyadaa gum-geen hai jaane kaun

is dil pe itne patthar hai pade, ke dil hi patthar ka ho chala
in zakhmo ka ilaaj bhi hota, par, marham chura le gaya jaane kaun

vo hai jaise aina mera, aur main uska hi aks hua
mere hi andar rehta hai, mujh jaisa hi jaane kaun

haathon mein laqirein hain phir bhi, taqdeer kyu naraaz hai
meri mukaddar se dushmani ki saazish kar gaya jaane kaun

For my Hindi Readers:

खुशनुमा आंखो के भीतर, छुपि नमि पेहचाने कौन
ज़ाहिर खुशि हर कोइ जाने, दिल में दर्द है जाने कौन

रात और दिन बस येहि सिलसिला, कौन सहि है कौन गलत
लम्हा लम्हा टूट टूट कर, खत्म हो रहा जाने कौन

धीमे धीमे पिघलते हुए, अरमानों के शफ़्फ़क ये जाम
गुमशुदा कोइ शख्स मज़े से, पी रहा है जाने कौन

सुबह सुबह हर रोज़ वहिं से, उगता है सुरज, कोइ शक नहि
कौनसि ऐसि सेहेर मेन डूबा, अंधेरा फिर भि है जाने कौन

वो जो खो गया एक पल में, सदियों से जो पा ना सका
दीवनगी को सर पे बांध के, ढूंड रहा है जाने कौन

मेरि हि तरह दर्द मेन डूबा, मेरे लिबास में कौन है तु
कोइ बात चले तो अनदाज़ा हो, ज़्यादा गम-गीन है जाने कौन

इस दिल पे इतने पथ्थर है पडे, के दिल हि पथ्थर का हो चला
इन ज़ख्मों का इलाज भि होता, पर, मरहम चुरा ले गया जाने कौन

वो है जैसे आईना मेरा, और मैं उसका हि अकस हुअ
मेरे हि अंदर रेहता है, मुझ जैसा हि जाने कौन

हाथों में लकिरें हैं फिर भि, तकदीर क्युं नाराज़ है
मेरि मुकद्दर से दुश्मनि कि साज़िश कर गया जाने कौन

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3 Responses to “KAUN”

  1. Reena said

    खुशनुमा आंखो के भीतर, छुपि नमि पेहचाने कौन
    ज़ाहिर खुशि हर कोइ जाने, दिल में दर्द है जाने कौन

    रात और दिन बस येहि सिलसिला, कौन सहि है कौन गलत
    लम्हा लम्हा टूट टूट कर, खत्म हो रहा जाने कौन

    धीमे धीमे पिघलते हुए, अरमानों के शफ़्फ़क ये जाम
    गुमशुदा कोइ शख्स मज़े से, पी रहा है जाने कौन

    सुबह सुबह हर रोज़ वहिं से, उगता है सुरज, कोइ शक नहि
    कौनसि ऐसि सेहेर मेन डूबा, अंधेरा फिर भि है जाने कौन

    वो जो खो गया एक पल में, सदियों से जो पा ना सका
    दीवनगी को सर पे बांध के, ढूंड रहा है जाने कौन

    मेरि हि तरह दर्द मेन डूबा, मेरे लिबास में कौन है तु
    कोइ बात चले तो अनदाज़ा हो, ज़्यादा गम-गीन है जाने कौन

    इस दिल पे इतने पथ्थर है पडे, के दिल हि पथ्थर का हो चला
    इन ज़ख्मों का इलाज भि होता, पर, मरहम चुरा ले गया जाने कौन

    वो है जैसे आईना मेरा, और मैं उसका हि अकस हुअ
    मेरे हि अंदर रेहता है, मुझ जैसा हि जाने कौन

    हाथों में लकिरें हैं फिर भि, तकदीर क्युं नाराज़ है
    मेरि मुकद्दर से दुश्मनि कि साज़िश कर गया जाने कौन

  2. anitakumar said

    aap ki rachna dil ko chooti hai
    sirf ek hi kami thi…spelling mistakes bahut thin devnagari mein likhi kavita mein unhein sudhar kar yahan de rahi hun..aasha hai aap bura nahi maange
    खुशनुमा आंखों के भीतर, छुपी नमी पहचाने कौन
    ज़ाहिर खुशी हर कोई जाने, दिल में दर्द है जाने कौन

    रात और दिन बस यही सिलसिला, कौन सही है कौन गलत
    लम्हा लम्हा टूट टूट कर, खत्म हो रहा जाने कौन

    धीमे धीमे पिघलते हुए, अरमानों के शफ़्फ़क ये जाम
    गुमशुदा कोई शख्स मज़े से, पी रहा है जाने कौन

    सुबह सुबह हर रोज़ वहीं से, उगता है सूरज, कोई शक नही
    कौन सी ऐसी सहर में डूबा, अंधेरा फिर भी है जाने कौन

    वो जो खो गया एक पल में, सदियों से जो पा ना सका
    दिवानगी को सर पे बांध के, ढूंढ रहा है जाने कौन

    मेरी ही तरह दर्द में डूबा, मेरे लिबास में कौन है तू
    कोई बात चले तो अंदाज़ा हो, ज़्यादा गम-गीन है जाने कौन

    इस दिल पे इतने पत्थर हैं पड़े, के दिल ही पत्थर का हो चला
    इन ज़ख्मों का इलाज भी होता, पर, मरहम चुरा ले गया जाने कौन

    वो है जैसे आईना मेरा, और मैं उसका ही अक्स हुआ
    मेरे ही अंदर रहता है, मुझ जैसा ही जाने कौन

    हाथों में लकीरें हैं फिर भी, तकदीर क्युं नाराज़ है
    मेरी मुकद्दर से दुश्मनी कि साज़िश कर गया जाने कौन

  3. shiwuz said

    @Reena: Welcome, and Thank you for taking time to write it up in devanagari script.

    @Anitakumar: Bura maanne ka to savaal hi nahi uthta, mein to aapki aabhari hoon k aapne itni baariki se ye kavita padh kar usko sahi karne ka prayaas kiya. Aate rahiye aur baki kavitao par bhi aapki tippani dete rahiye, hamein bohot khushi hogi.

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